राज्यपाल की भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण विचार

1- राष्ट्रपिता महात्‍मा गांधी के विचार :-


"जितना मैं सरकारी खजाने के एक-एक पैसे को बचाना चाहता हूं, राज्‍य के राज्यपालों को दूर करना और मुख्यमंत्रियों को एक पूर्ण समकक्ष के रूप में मानना ख़राब अर्थव्यवस्था होगी। हालांकि मैं राज्यपालों को दी जाने वाली हस्तक्षेप की अधिक शक्ति का विरोध करता हूं, मुझे नहीं लगता कि उन्हें केवल कल्पित व्यक्ति होना चाहिए। उनके पास पर्याप्त शक्ति होनी चाहिए, जिससे वे बेहतर के लिए मंत्रिस्तरीय नीति को प्रभावित कर सकें। अपनी अलग स्थिति में, वे चीजों को उनके उचित परिप्रेक्ष्य में देखने में सक्षम होंगे और इस प्रकार उनके मंत्रिमंडलों द्वारा गलतियों को रोकेंगे। उनका अपने राज्‍यों में एक व्यापक प्रेरक प्रभाव होना चाहिए।"

“राज्यपाल को टीम की योजना में एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण और अहम स्थान दिया गया था। जब राज्य में संवैधानिक गतिरोध होगा तो वह मध्यस्थ होंगे और वह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम होंगे।"

2- भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद जी के विचार :-

"कोऑपरेटीव फेडरेलिश्‍म के वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में राज्‍यपालों द्वारा संविधान के परिरक्षण, सरंक्षण और प्रतिरक्षण तथा जनता की सेवा और कल्‍याण में विरत रहने का आपका संवैधानिक दायित्‍व और भी अहम हो जाता है । आप सब केन्‍द्र और राज्‍यों के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं । संविधान की धारा 168 के अनुसार, राज्‍यपाल अपने प्रदेश की विधायिकाकेएक अहम अंग होते हैं । भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्‍यपाल का ओहदा बहुत ऊंचा होता है । आप संवैधानिक आदर्शो और मर्यादाओं के प्रतीक हैं । कुछ विशेषाधिकार केवल राज्‍यपालों को ही उपलब्‍ध है । राज्‍य की जनता की निगाहें लोक भवन पर टिकी रहती है । लोक भवन का सभी पर अनुकरणीय प्रभाव पड़ता है । लोक भवनों में मूल्‍यों और आदर्शो के स्‍थापित होने से सार्वजनिक जीवन से जुड़े बुद्धिजीवी, स्‍वयं सेवी संस्‍थान और समाज के सभी वर्ग के लोग प्रेरणा लेते हैं ।‘’
‘’राज्यपाल के संवैधानिक पद की एक विशेष गरिमा होती है । राज्‍य सरकार के मार्ग-दर्शक तथा हमारे संघीय ढांचे की एक महत्‍वपूर्ण कड़ी के रूप में राज्‍यपाल अपना निरंतर योगदान देते हैं । राज्‍य की जनता राज्‍यपालों को आदर्शो और मूल्‍यों के कस्‍टो‍डियन के रूप में देखती है ।‘’

‘’संवैधानिक व्‍यवस्‍था में राज्‍यपाल की अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है । आज जब हम सहकारी संघवाद और देश की प्रगति के हित में स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्धात्‍मक संघवाद यानि कॉम्‍पीटेटीव फेडरेशन पर जोर दे रहे हैं तो राज्‍यपाल की भूमिका और भी महत्‍वपूर्ण हो जाती है ।‘’

3- भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम के विचार :-

“संविधान ने राज्यपाल के लिए एक विशेष भूमिका प्रदान की है। यह पवित्रता के साथ एक स्थिति है। जबकि संविधान द्वारा प्रदान किए गए कई नियंत्रण और संतुलन हैं, राज्यपाल के कार्यालय को दिन-प्रतिदिन की राजनीति से ऊपर उठने और केंद्रीय प्रणाली या प्रणाली से निकलने वाली मजबूरियों को दूर करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। राज्यपाल की भूमिका राजनीति के उतार-चढ़ाव से लोगों की सर्वोत्तम आकांक्षाओं को दूर करना है। यह धर्म के प्रकाश को संरक्षित करने जैसा है ।‘’

4- भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के विचार :-

“राज्यपाल अपने राज्‍य के पहले नागरिक हैं। जब आपने यह उच्च पद ग्रहण किया था, तब आपने संविधान की परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने की शपथ ली थी। यह पवित्र दस्तावेज लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है और नागरिकों की भलाई को बढ़ावा देता है। यह समावेशिता, सहिष्णुता, आत्म-संयम, और महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को हमारी राजनीति के आवश्यक तत्व के रूप में निर्धारित करता है। लोकतंत्र की हमारी संस्थाओं को इन महत्वपूर्ण विशेषताओं पर काम करना चाहिए। मजबूत विश्वसनीय संस्थान लोकतंत्र के स्वस्थ कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए सुशासन की ओर ले जाते हैं।"

5- माननीय सुप्रीम कोर्ट निर्णय 1979 ; हरगोविंद/ रघुकुल तिलक अनुसार :-

“संविधान राज्यपाल को एक संवैधानिक प्रहरी की भूमिका प्रदान करता है और एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय के धारक होने के नाते संघ और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में, राज्यपाल केंद्र सरकार के अधीनस्थ या अधीनस्थ एजेंट नहीं है।"

6- सरकारिया, कमीशन रिपोर्ट के विचार :-

“कोई भी निर्णय लेने से पहले, राज्यपाल को अपनी शपथ को याद करना चाहिए कि वह संविधान का परिरक्षक और रक्षक है। यदि राज्यपाल ऐसा करता है, तो किसी भी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होने की संभावना नहीं है, किसी भी संवैधानिक परंपरा के पराजित होने की संभावना नहीं है और उसकी किसी भी कार्रवाई की निंदा होने की संभावना नहीं है।"

“संविधान राज्यपाल को एक संवैधानिक प्रहरी और संघ और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका प्रदान करता है। एक स्वतंत्र संवैधानिक पद का धारक होने के कारण राज्यपाल केंद्र सरकार का अधीनस्थ या अधीनस्‍थ एजेंट नहीं होता है।"


राज्‍यपाल एवं उसकी भूमिका

प्रस्‍तावना :-


भारत के संविधान के अनुच्‍छेद 153 अनुसार प्रत्‍येक राज्‍य के लिए एक राज्‍यपाल होगा । राज्‍यपाल का पद एक संवैधानिक पद है - अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण एवं गरिमामय । भारत के संविधान के अंतर्गत जिस परिसंघीय ढांचे की संरचना की गई है उसमें राज्‍यपाल, केन्‍द्र तथा राज्‍यों के बीच एक सुद़ृढ पुल के समान है । राज्‍य और केन्‍द्र के अन्‍तरसंबंध बहुत कुछ राज्‍यपाल के व्‍यक्तित्‍व के ऊपर निर्भर करते हैं । राज्‍यपाल का पद मात्र शोभा का पद नहीं है । एक ओर जहां वह केन्‍द्र सरकार के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है वहीं दूसरी ओर वह राज्‍य का संवैधानिक प्रमुख भी है और इस नाते राज्‍य के हितों तथा कल्‍याण के संरक्षण का परम तथा महत् दायित्‍व उसके कंधो पर है ।

नियुक्ति :-


भारत के संविधान अनुच्‍छेद 155 अनुसार राज्‍यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति अपने हस्‍ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करते हैं ।

पदावधि :-


भारत के संविधान अनुच्‍छेद 156 अनुसार –

  • राज्‍यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्‍त पद धारण करेगा ।
  • राज्‍यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्‍ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्‍याग सकेगा ।
  • राज्‍यपाल की पदावधि 5 वर्ष निर्धारित है ।

अर्हता :-


भारत के संविधान अनुच्‍छेद 157 अनुसार राज्‍यपाल नियुक्‍त होने का पात्र व्‍यक्ति भारत का नागरिक हो और 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो ।

शर्तें :-


भारत के संविधान अनुच्‍छेद 158 अनुसार –

(1) राज्‍यपाल विधानमंडल या संसद का सदस्‍य नहीं होगा,

(2) अन्‍य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा,

(3) उपलब्धियॉं तथा भत्‍तों का हकदार होगा ।

शपथ :-


भारत के संविधान अनुच्‍छेद 159 अनुसार राज्‍यपाल को राज्‍य के उच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायमूर्ति द्वारा शपथ दिलायी जायेगी । शपथ/प्रतिज्ञान अर्थात् – ‘’ मैं, अमुक, ईश्‍वर की शपथ लेता हॅू कि मैं सत्‍यनिष्‍ठा से प्रतिज्ञा करता हॅू राज्‍यपाल के पद का कार्यपालन करूँगा तथा अपनी पूरी योग्‍यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण्‍ और प्रतिरक्षण करूंगा और मैं ----------- राज्‍य की जनता की सेवा और कल्‍याण में निरत रहूँगा ।‘’


राज्‍यपाल की वैधानिक शक्तियॉं

1. कार्यपालिका शक्तियॉं


• राज्यपाल राज्य सरकार का कार्यकारी प्रमुख होते हैं। राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति उसी में निहित होती है। राज्य सरकार के सभी कार्यकारी निर्णय उनके नाम पर लिए जाते हैं। वे सरकार के कार्यों के संचालन के लिए नियम बनाते है और मंत्रियों के बीच विभिन्न कार्यों का आवंटन करते है।

• राज्‍यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते है और उसकी सलाह पर अपनी मंत्रिपरिषद का गठन करने के लिए अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं और मुख्यमंत्री सहित अपने मंत्रियों को बर्खास्त कर सकते हैं।

• राज्‍यपाल उच्च नियुक्तियाँ जैसे कि महाधिवक्ता, अध्यक्ष और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य आदि करते हैं। राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मामलों में राष्ट्रपति द्वारा उनसे परामर्श किया जाता है।

• राज्‍यपाल को राज्य के प्रशासन के बारे में आवश्यक जानकारी के बारे में मुख्यमंत्री द्वारा सूचित रखने का अधिकार है।

• राज्‍यपाल संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने के संबंध में अपनी सिफारिशों के साथ-साथ राज्य में संवैधानिक तंत्र के टूटने के संबंध में राष्ट्रपति को रिपोर्ट कर सकते हैं।

• राज्‍यपाल राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में कार्य करते हैं।

2. विधायी शक्तियॉं


• राज्यपाल राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाते हैं और उसका सत्रावसान करते है।

• चुनाव आयोग की सलाह पर वह विधायकों की अयोग्यता से संबंधित मामले का फैसला कर सकते हैं।

• राज्‍यपाल विधानसभा को संबोधित कर सकते हैं।

• उनके पास वीटो पावर है। राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक उनकी सहमति के अधीन है।

• जब सदन का सत्र नहीं चल रहा हो तो वह अध्यादेश जारी कर सकते हैं।

3. वित्‍तीय शक्तियॉं


• राज्‍यपाल की पूर्व सिफारिश के बिना राज्य विधानमंडल में धन विधेयक पेश नहीं किया जा सकता है।

• राज्य की आकस्मिक निधि उनके निपटान में है। वह राज्य विधानमंडल द्वारा इनकी अनुमति के लंबित रहने तक एक अप्रत्याशित व्यय को पूरा करने के लिए इसमें से अग्रिम कर सकते हैं।

• राज्‍यपाल विधायिका के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने का कारण बनता है।

• राज्‍यपाल विधायिका के समक्ष राज्य के खातों से संबंधित भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट रखते हैं।

4. न्‍यायिक शक्तियॉं


• राज्यपाल के पास अदालतों द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को क्षमादान देने या उनकी सजा को माफ करने या कम करने की शक्ति है।

• उन्‍हे अपने कार्यकाल के दौरान सभी दीवानी और आपराधिक कार्यवाही से व्यक्तिगत छूट प्राप्त है।

5. विवेकाधीन शक्तियॉं


• राज्यपाल किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए राज्य विधायिका द्वारा इस दलील पर पारित करने के बाद सुरक्षित रख सकते हैं कि यह केंद्र सरकार के कानून या नीति के विपरीत होने की संभावना है।

• राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर या अपने सर्वोत्तम निर्णय के अनुसार विधान सभा को भंग कर सकते हैं।

• राज्यपाल किसी कथित घोटाले या आपराधिक गड़बड़ी में शामिल सेवारत या पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दे सकते हैं।

6. राज्यपाल और उनके कार्यों के लिए संवैधानिक प्रावधान


अनुच्‍छेद 153
राज्‍यों के राज्‍यपाल

प्रत्‍येक राज्‍य के लिए एक राज्‍यपाल होगा ।
अनुच्‍छेद 154
राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति
राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति राज्‍यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग भारत संविधान के अनुसार स्‍वयं या अपने अधीनस्‍थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
अनुच्‍छेद 160
कुछ आकस्मिकताओं में राज्‍यपाल के क़़त्‍यों का निर्वहन
राष्ट्रपति ऐसी किसी आकस्मिकता में, जो संविधान के अध्‍याय II में उपबंधित नहीं है, राज्‍य के राज्‍यपाल के कृत्‍यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगा जो वह ठीक समझता है।
अनुच्‍छेद 161
क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलम्‍बन, परिहार या लघुकरण की राज्‍यपाल की शक्ति
किसी राज्‍य के राज्‍यपाल को उस विषय, जिस विषय पर उस राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति का विस्‍तार है, किसी विधि के विरूद्ध किसी अपराध के लिए सिद्ध दोष ठहराये गये व्‍यक्ति के दण्‍ड को क्षमा, उसका प्रविलंबन विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी।
अनुच्‍छेद 163
राज्‍यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद्
जिन बातों में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्‍यपाल से यह अपेक्षितहै कि वह अपने कृत्‍यों या उनमें से किसी को अपने विवेकानुसार करें उन बातों को छोडकर राज्‍यपाल को अपने कृत्‍यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिये एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रधान, मुख्‍यमंत्री होगा।
अनुच्‍छेद 164
मंत्रियों के अन्‍य उपबंध
राज्‍यपाल मुख्‍यमंत्री एवं अन्‍य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।
अनुच्‍छेद 165
राज्‍य का महाधिवक्‍ता
राज्‍य के लिए महाधिवक्‍ता की नियुक्ति राज्‍यपाल करते हैं।
अनुच्‍छेद 166
राज्‍य की सरकार के कार्य का संचालन
किसी राज्‍य की सरकार की समस्‍त कार्यपालिका कार्रवाई राज्‍यपाल के नाम से की हुई कही जायेगी ।
अनुच्‍छेद 167
राज्‍यपाल को जानकारी देने आदि के संबंध में मुख्‍यमंत्री के कर्त्‍तव्‍य
प्रत्‍येक राज्‍य के मुख्‍यमंत्री का यह कर्तव्‍य होगा कि वह :
1 राज्‍य के कार्यो के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्‍थापनाओं संबंधी मंत्रि-परिषद के सभी विनिश्‍चय राज्‍यपाल को संसूचित करें,
2 राज्‍य के कार्यो के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्‍थापनाओं संबंधी जो जानकारी राज्‍यपाल मांगे वह दे : और
3 किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्‍चय कर दिया है किन्‍तु मंत्रिपरिषद् ने विचार नहीं किया है, राज्‍यपाल द्वारा अपेक्षा किये जाने पर परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे।
अनुच्‍छेद 168
राज्‍यों के विधानमंडलों का गठन
प्रत्‍येक राज्‍य के लिए एक विधानमंडल होगा जो राज्‍यपाल से मिलकर बनेगा।
अनुच्‍छेद 174
राज्‍य के विधानमंडल के सत्र, सत्रावसान और विघटन
राज्‍यपाल समय-समय पर सदन को आहूत या सत्रावसान करेगा, और विधानसभा का विघटन करेगा।
अनुच्‍छेद 175
सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्‍यपाल का अधिकार
राज्‍यपाल विधान सभा में अभिभाषण कर सकेगा, राज्‍यपाल सदन को संदेश भेज सकेगा ।
अनुच्‍छेद 176
राज्‍यपाल का विशेष अभिभाष्‍ण
राज्‍यपाल द्वारा सदन के लिए विशेष अभिभाषण
अनुच्‍छेद 188
सदस्‍यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
राज्य की विधानसभा या विधान परिषद का प्रत्‍येक सदस्‍य अपना स्‍थान ग्रहण करने से पहले, राज्‍यपाल या उसके द्वारा इस निमित्‍त नियुक्‍त व्‍यक्ति के समक्ष्‍, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिये गये प्रारूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपना हस्‍ताक्षर करेगा ।
अनुच्‍छेद 192
सदस्‍यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्‍नों पर विनिश्‍चय
सदस्‍यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्‍नों पर विनिश्‍चय।
अनुच्‍छेद 200
विधेयकों पर अनुमति
विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर विचार करने के लिए राज्‍यपाल अनुमति देता है, अनुमति रोक लेता है या आरक्षित रखता है।
अनुच्‍छेद 201
विचार के लिए आरक्षित विधेयक
जब कोई विधेयक राज्‍यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है तब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है। परन्‍तु जहॉं विधेयक धन विधेयक नहीं है वहॉं राष्ट्रपति राज्‍यपाल को यह निर्देश दे सकेगा कि वह विधेयक को, यथास्थिति राज्‍य के विधनमंडल के सदन या सदनों को लौटा दे....... राष्ट्रपति के समक्ष उसके विचार के लिए फिर से प्रस्‍तुत किया जाएगा ।
अनुच्‍छेद 151 (2)
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की राज्‍य से संबंधित लेखा रिपोर्ट विधानसभा के समक्ष रखने के पूर्व राज्‍यपाल को प्रस्‍तुत की जायेगी ।
अनुच्‍छेद 202
वार्षिक वित्‍तीय विवरण
राज्‍यपाल प्रत्‍येक वित्‍तीय वर्ष के संबंध में सदन के समक्ष प्राक्‍कलित प्राप्तियों और व्‍यय का विवरण रखवाएगा।
अनुच्‍छेद 203
विधानमंडल के प्राक्‍कलनों के संबंध में प्रक्रिया
किसी अनुदान की मॉंग राज्‍यपाल की सिफारिश पर ही की जायेगी, अन्‍यथा नही।
अनुच्‍छेद 205
अनुपूरक, अतिरिक्‍त या अधिक अनुदान
राज्‍यपाल, यथास्थिति, सदन के समक्ष व्‍यय की प्राक्‍कलित रकम को दर्शित करने वाला दूसरा विवरण रखवाएगा।
अनुच्‍छेद 207
वित्‍त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध
अनुच्‍छेद 199 के खंड (1) के उपखंड (क) से उपखंड (च) में विनिर्दिष्‍ट किसी विषय के लिए उपबंध करने वाला विधेयक या संशोधन राज्‍यपाल की सिफारिश से ही पुर: स्‍थापित या प्रस्‍तावित किया जायेगा अन्‍यथा नहीं और ऐसा उपबंध करने वाला विधेयक, ----- किसी कर को घटाने या उत्‍सादन के लिए ----- नहीं होगी।
अनुच्‍छेद 217
उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्ते
भारत के मुख्‍य न्‍यायमूर्ति से, उस राज्य के राज्‍यपाल से और नियुक्ति की दशा में ....... राष्ट्रपति अपने हस्‍ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्‍च न्‍यायालय के प्रत्‍येक न्‍यायाधीश की नियुक्ति करेगा ...... जब तक वह बासठ वर्ष की आयु प्राप्‍त नहीं कर लेता है।
अनुच्‍छेद 219
उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
उच्‍च न्‍यायालय का न्‍यायाधीश होने के लिए नियु‍क्‍त, प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपना पद ग्रहण करने से पहले, उस राज्‍य के राज्‍यपाल या ...... व्‍यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए......
अनुच्‍छेद 233
जिला न्‍यायाधीशों की नियुक्ति
किसी भी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति राज्य के राज्यपाल द्वारा ऐसे राज्य के संबंध में अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी।
अनुच्‍छेद 243(झ)
वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
राज्‍य का राज्यपाल, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर यथाशीघ्र, और तत्‍पश्चात प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर, वित्‍त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्‍तीय स्थिति का पुनर्विलोकन के लिए सिफारिश करेगा।
अनुच्‍छेद 243(झ)(4)
वित्‍त आयोग
राज्यपाल इस अनुच्‍छेद के अधीन आयोग द्वारा की गई प्रत्‍येक सिफारिश को, उस पर की गई कार्रवाई के स्‍पष्‍टीकारक ज्ञापन सहित, राज्‍य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा।
अनुच्‍छेद 267(2)
आकस्मिकता निधि
राज्‍य का विधानमंडल, विधि द्वारा अग्रदाय के स्‍वरूप की एक आ‍कस्मिकता निधि की स्‍थापना कर सकेगा जो ‘’ राज्‍य की आकस्मिकता निधि ‘’ के नाम से ज्ञात होगी जिसमें ऐसी विधि द्वारा अवधारित राशियॉं समय समय पर जाम की जाएंगी और अनवेक्षित व्‍यय का अनुच्‍छेद 205 या अनुच्‍छेद 206 के अधीन राज्‍य के विधानमंडल द्वारा, विधि द्वारा, प्राधिकृत किया जाना लंबित रहने तक ऐसी निधि में से ऐसे व्‍यय की पूर्ति के लिए अग्रिम धन देने के लिए राज्‍यपाल को समर्थ बनाने के लिए उक्‍त राजयपाल के व्‍ययनाधीन रखी जाएगी।
अनुच्‍छेद 299
संविदाएं
संघ या राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में किए गए सभी संविदाओं को राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल द्वारा, की गई कही जाएंगी और वे सभी संविदाएं और संपत्ति संबंधी हस्‍तांतरण-पत्र, जो उस शक्ति का प्रयोग करते हुए किए जाए, राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से ऐसे व्‍यक्तियों द्वारा और रीति से निष्‍पादित किये जाएंगे जिसे वह निर्दिष्‍ट या प्राधिकृत करें।
अनुच्‍छेद 316
लोक सेवा आयोग के सदस्‍यों की नियुक्ति और पदावधि
लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष और अन्‍य सदस्‍यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्‍त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्‍य आयोग है तो, राज्‍यपाल द्वारा की जायेगा।
अनुच्‍छेद 317
लोक सेवा आयोग के किसी सदस्‍य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना
आयोग के अध्‍यक्ष या किसी अन्‍य सदस्‍य को, जिसके संबंध में खंड (1) के अधीन उच्‍चतम न्‍यायालय को निर्देश किया गया है कि राज्‍य आयोग की दशा में राज्‍यपाल उसके पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्‍चतम न्‍यायालय का प्रतिवेदन मिलनेपर अपना आदेश पारित नहीं कर देता है।
अनुच्‍छेद 318
आयोग के सदस्‍यों और कर्मचारिवृंद की सेवा की शर्तो के बारे में विनियम बनाने की शक्ति
संघ आयोग या संयुक्‍त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्‍य आयोग की दशा में उस राज्‍य का राज्‍यपाल विनियमों द्वारा आयोग के सदस्‍यों की संख्‍या और उनकी सेवा की शर्तो का अवधारण कर सकेगा और आयोग के कर्मचारिवृंद के सदस्‍यों की संख्‍या और उनकी सेवा की शर्तो के संबंध में उपबंध कर सकेगा।
अनुच्‍छेद 323 (2)
लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन
राज्‍य आयोग का यह कर्त्‍तव्‍य होगा कि वह राज्‍य के राज्‍यपाल को आयोग द्वारा किये गये कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और संयुक्‍त आयोग का यह कर्त्‍तव्‍य होगा कि ऐसे राज्‍यों में से प्रत्‍येक के, जिनकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति संयुक्‍त आयोग द्वारा की जाती है, राज्‍यपाल को उस राज्‍य के संबंध में आयोग द्वारा किये गये कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और दोनेां में से प्रत्‍येक दशा में ऐसा प्रतिवेदन प्राप्‍त होने पर राज्‍यपाल उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्‍वीकार नहीं की गई थी, ऐसी अस्‍वीक़ृति के कारणों को स्‍पष्‍ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति राज्‍य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगा।
अनुच्‍छेद 324(6)
निर्वाचन आयोग के अनुरोध पर कर्मचारी उपलब्‍ध कराने
जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करे तब राज्‍यपाल निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्‍त को उतने कर्मचारिवृंद उपलब्‍ध करायेगा जो निर्वाचन आयोग को सौंपे गये कार्यो के निर्वहन के लिए आवश्‍यक हो।
अनुच्‍छेद 333
आंग्‍ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्‍व
राज्‍यों की विधानसभाओं में आंग्‍ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्‍व
अनुच्‍छेद 338 (7)
जहां ऐसी कोई रिपोर्ट या उसका कोई भाग किसी ऐसे मामले से संबंधित है, ि‍‍‍जसका संबंध राज्‍य सरकार से है, वहां ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति राज्‍य सरकार को भेजी जाएगी, जो उसे, राज्‍य से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किये जाने के लिए प्रस्‍तावित कार्रवाई को स्‍पष्‍ट करने वाले ज्ञापन और ऐसी किसी सिफारिश की अस्‍वीकृति के कारणों, यदि कोई हो, सहित राज्‍य के विधान मंडल के समक्ष रखवाएगा ।
अनुच्‍छेद 341 (1)
अनुसूचित जातियॉं
राष्ट्रपति राज्‍यपाल के परामर्श पश्‍चात् लोक अधिसूचना द्वारा, उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्‍ट कर सकेगा जिन्‍हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए उस राज्‍य के संबंध में अनुसूचित जातियॉं समझा जाएगा ।
अनुच्‍छेद 342 (1)
अनुसूचित जनजातियॉं
राष्ट्रपति राज्‍यपाल के परामर्श पश्‍चात् लोक अधिसूचना द्वारा, उन जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्‍ट कर सकेगा जिन्‍हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए उस राज्‍य के संबंध में अनुसूचित जनजातियॉं समझा जाएगा ।
अनुच्‍छेद 355 एवं 356
राष्ट्रपति शासन
1 केन्‍द्र के प्रतिनिधि के रूप में राज्‍यपाल सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास के बारे में राष्ट्रपति को नियतकालिक प्रतिवेदन भेजकर जानकारी देगा। 2 यदि राज्‍य के हित में राज्‍यपाल महसूस करता हो कि केन्‍द्र को हस्‍तक्षेप करना चाहिए तो ऐसा कहने के लिए वह कर्त्‍तव्‍य द्वारा आबद्ध है। 3 राज्‍यपाल अनुच्‍छेद 356 के अधीन सुनिश्‍चित करता है कि राज्‍य का प्रशासन संविधान के उपबंधों के अनुसार चले और अथवा राष्ट्रपति शासन घोषित करने के लिए राष्ट्रपति को परामर्श देता है।
अनुच्‍छेद 361
राष्ट्रपति और राज्‍यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण
1 राष्ट्रपति अथवा राज्‍य का राज्‍यपाल या राजप्रमुख अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्त्‍तव्‍यों के पालन के लिए या उन शक्तियों का प्रयोग और कर्त्‍तव्‍यों का पालन करते हुए अपने द्वारा किये गये या किये जाने के लिए तात्‍पर्यित किसी कार्य के ‍लिए किसी न्‍यायालय को उत्‍तरदायी नहीं होगा; परन्‍तु अनुच्‍छेद 61 के अधीन आरोप के अन्‍वेषण के लिए संसद के किसी सदन द्वारा नियुक्‍त या अभिहित किसी न्‍यायालय, अधिकरण या निकाय द्वारा राष्ट्रपति के आचरण का पुनर्विलोकन किया जा सकेगा; परन्‍तु यह और कि इस खंड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह भारत सरकार या किसी राज्‍य की सरकार के विरूद्ध समुचित कार्यवाहियॉं चलाने के किसी व्‍यक्ति के अधिकार को निर्बंधित करती है ।
2 राष्ट्रपति या किसी राज्‍य के राज्‍यपाल के विरूद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्‍यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी।
3 राष्ट्रपति या किसी राज्‍य के राज्‍यपाल के विरूद्ध उसकी पदावधि के दौरान उसकी गिरफतारी या कारावास के लिए किसी न्‍यायालय से कोई आदेशिका निकाली नहीं जाएगी ।

4 अनुसूचित क्षेत्रो/जनजातीय क्षेत्रो के संदर्भ में राज्‍यपाल की शक्तियॉं


भारत के संविधान के अनुच्छेद 244 में आदिवासी क्षेत्रों के संदर्भ में प्रावधान हैं। यह निर्धारित किया गया है कि पांचवीं अनुसूची के प्रावधान राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण पर लागू होंगे।

पॉचवी अनुसूची

अनुच्‍छेद 244(1)

अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रणके बारे में उपबंध

भाग क

(2) अनुसूचित क्षेत्रों में किसी राज्‍य की कार्यपालिका शक्ति-


इस अनुसूची के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी राज्‍य की कार्यवालिका शक्ति का विस्‍तार उसके अनुसूचित क्षेत्रों पर है।

(3) अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को राज्‍यपाल द्वारा प्रतिवेदन –


– अनुसूचित क्षेत्रों के राज्‍यपाल प्रतिवर्ष या जब भी राष्ट्रपति इस प्रकार अपेक्षा करे, उस राज्‍य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा और संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्‍तार राज्‍य को उक्‍त क्षेत्रोंके प्रशासन के बारे में निदेश देने तक होगा।